गुजरात के सबसे खूबसूरत और प्राचीन मंदिर! कौन से हैं ये 11 प्रसिद्ध मंदिर और क्यों हैं खास? जानने के लिए आगे पढ़ें!
गुजरात में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें सोमनाथ मंदिर सबसे प्रमुख है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। द्वारकाधीश मंदिर भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका में स्थित है। अंबाजी मंदिर, गिरनार का भवानी मंदिर और स्वामिनारायण अक्षरधाम मंदिर भी भक्तों के लिए आस्था के प्रमुख केंद्र हैं।
गुजरात को भारत के सबसे प्रमुख आध्यात्मिक राज्यों में से एक माना जाता है, क्योंकि यहाँ धर्म, संस्कृति और परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहाँ के मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र हैं, बल्कि अपनी वास्तुकला, दिव्यता और पौराणिक महत्व के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। यह राज्य सनातन धर्म और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ हर मंदिर एक विशेष ऊर्जा और दिव्यता का प्रतीक है।
भारत के प्राचीन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार गुजरात सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी के रूप में प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहाँ स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, अंबाजी शक्तिपीठ, गिरनार पर्वत और जैन तीर्थस्थलों ने इसे आज के समय में आध्यात्मिक यात्रा का प्रमुख केंद्र बना दिया है।
नवरात्रि उत्सव की भव्यता, अक्षरधाम मंदिर की शांति, गिरनार पर्वत की आध्यात्मिक ऊंचाइयाँ और द्वारकाधीश मंदिर की पवित्रता—यह सब मिलकर गुजरात को एक धार्मिक और तीर्थयात्रा का स्वर्ग बनाते हैं।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला और सबसे पवित्र शिव मंदिर माना जाता है। जोकि त्रेता युग से पूजनीय है। पुराणों में वर्णित है कि स्वयं चंद्रदेव ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर प्रभास क्षेत्र में समुद्र तट पर स्थित है, जहाँ भगवान कृष्ण ने अपना देहत्याग किया था।
इस मंदिर का इतिहास बहुत गौरवशाली और संघर्षपूर्ण रहा है। महमूद गजनी, अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब जैसे आक्रमणकारियों ने इसे कई बार ध्वस्त किया, लेकिन हर बार भक्तों ने इसे पुनर्निर्मित किया। वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण भारत की स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल के प्रयासों से हुआ। मंदिर की वास्तुकला चंदेल शैली की है, जिसमें सोने का कलश और समुद्र की ओर इंगित "दिग्विजय स्तंभ" स्थित है। सोमनाथ महादेव, अनादि और अविनाशी हैं, जिनका यह धाम युगों-युगों से भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
गुजरात का द्वारकाधीश मंदिर, हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण के प्रस्थान के बाद द्वारका समुद्र में विलीन हो गई, लेकिन बाद में भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ ने उनके भक्तों की आस्था के लिए इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। मंदिर की ऊँचाई लगभग 78 मीटर है, और इसके शिखर पर 52 गज की भव्य ध्वजा लहराती है, जिसे दिन में पाँच बार बदला जाता है। मंदिर पंचरात्र शास्त्र के अनुसार बना है, जिसमें श्रीकृष्ण को द्वारकाधीश स्वरूप में पूजा जाता है। गर्भगृह में कृष्ण की चतुर्भुजी मूर्ति विद्यमान है। साथ ही, बलराम, रुक्मिणी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं।
गुजरात का भव्य स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर भगवान स्वामीनारायण को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 1992 में बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था द्वारा किया गया था। मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान स्वामीनारायण को समर्पित है, जहाँ उनकी सोने से सजी हुई भव्य मूर्ति विराजमान है। इसके अलावा, यहाँ अन्य देवताओं की भी मूर्तियाँ स्थापित हैं।
अक्षरधाम मंदिर की वास्तुकला अनुपम है—यह गुलाबी बलुआ पत्थरों से निर्मित है और इसमें पारंपरिक भारतीय मंदिर निर्माण शैली का सुंदर समावेश किया गया है। मंदिर परिसर में सहजानंद वाटिका, अंडरग्राउंड प्रदर्शनी, साउंड-लाइट शो और वाटर शो जैसी आकर्षक गतिविधियाँ हैं, जो भक्तों को भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की गहरी झलक दिखाती हैं।
गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित अंबाजी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ माँ सती का हृदय गिरा था। यहाँ माँ अंबा की मूर्ति नहीं, बल्कि श्री यंत्र की पूजा होती है। सफेद संगमरमर से बना यह भव्य मंदिर 103 फीट ऊँचा है, जिसका शिखर सोने से अलंकृत है। गर्भगृह में प्रतिष्ठित श्री यंत्र पर केवल पुजारियों को ही दर्शन करने की अनुमति है। नवरात्रि में यहाँ भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर शक्ति, भक्ति और सिद्धियों का प्रतीक है, जहाँ भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए माँ अंबा की आराधना करते हैं।
द्वारका में स्थित रुक्मिणी देवी मंदिर भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी माता रुक्मिणी को समर्पित है। यह मंदिर द्वारकाधीश मंदिर से लगभग 2 किमी दूर स्थित है और 12वीं शताब्दी का माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण रुक्मिणी जी को द्वारका से दूर रहना पड़ा, इसलिए यह मंदिर नगर से अलग स्थित है। मंदिर की वास्तुकला नागर शैली की है, जिसमें दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी है।
गुजरात के पाटण जिले में स्थित मोढेरा सूर्य मंदिर भारत के प्राचीन सूर्य मंदिरों में से एक है। इसे सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम ने 1026 ईस्वी में बनवाया था। मंदिर की संरचना वास्तुशास्त्र और खगोलशास्त्र का अद्भुत संगम है। इस मंदिर में सूर्य देवता की मूर्ति इस तरह स्थापित है कि सूर्योदय की पहली किरण सीधे उनकी प्रतिमा पर पड़ती है।
इस मंदिर को तीन भागों में विभाजित किया गया है। जिसमें गुड़मंडप , रंगमंडप और सूर्यकुंड शामिल है।इन तीनों भागों में 108 छोटे मंदिर बने हैं। यह मंदिर अब पूजा स्थल नहीं है, लेकिन इसकी भव्य नक्काशी, खंभे और सूर्य उपासना का इतिहास इसे एक अद्वितीय धरोहर बनाते हैं।
गुजरात के सोमनाथ में स्थित भालका तीर्थ वह पवित्र स्थान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की थी। पुराणों के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद जब यदुवंश का विनाश हो गया, तब श्रीकृष्ण इस स्थान पर विश्राम कर रहे थे। तभी एक शिकारी जरा ने उन्हें हिरण समझकर उनके पैर के तलवे में तीर मार दिया। इस घटना के बाद, श्रीकृष्ण ने इसी स्थान से वैकुंठ धाम प्रस्थान किया। यहाँ श्रीकृष्ण की ध्यानमग्न प्रतिमा स्थित है, जो इस दिव्य घटना की स्मृति दिलाती है। यह तीर्थस्थान सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पास स्थित है और कृष्णभक्तों के लिए प्रमुख श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
गुजरात के सोमनाथ में स्थित भड़केश्वर महादेव मंदिर एक प्राचीन शिव मंदिर है, जो अरब सागर के बीच स्थित एक छोटे से द्वीप पर स्थित है। मान्यता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है, जिसे सागर ने अपने भीतर समेटने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार शिवलिंग पुनः स्थापित हो गया। समुद्र के बीच होने के कारण ज्वार-भाटे के समय मंदिर पानी में डूब जाता है और जब जलस्तर घटता है, तो यह फिर से दर्शन के लिए खुल जाता है। यह दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत अद्भुत और दिव्य अनुभव प्रदान करता है। शिवभक्तों के लिए यह मंदिर श्रद्धा और आस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
गुजरात के अहमदाबाद में स्थित हथीसिंह जैन मंदिर जैन वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है। यह मंदिर 1848 में व्यापारी हथीसिंह केसरसिंह ने जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ को समर्पित किया था। मंदिर की संरचना सफेद संगमरमर से बनी है और इसमें शिल्पकला की बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। इसकी ऊंची मीनारें, स्तंभ और गुंबद जैन वास्तुकला की भव्यता को दर्शाते हैं। मंदिर परिसर में एक 75 फीट ऊंचा धर्म स्तंभ भी है, जो इसकी दिव्यता को और बढ़ाता है। यह मंदिर न केवल जैन समुदाय के लिए बल्कि कला और इतिहास प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।
अहमदाबाद का जगन्नाथ मंदिर भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, जिसे 450 से अधिक वर्ष पहले साधु हनुमानदास जी ने स्थापित किया था। यह मंदिर ओड़िशा के प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर बना हुआ है और गुजरात में वैष्णव परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण हर साल निकलने वाली रथयात्रा है, जो पूरी की रथयात्रा के समान भव्य होती है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों को रथ पर विराजित कर नगर भ्रमण कराया जाता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र बना हुआ है।
गुजरात के अरावली पर्वत श्रृंखला में स्थित शामलाजी मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। इसे ध्वज वाला मंदिर भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ सदैव एक विशाल ध्वज लहराता रहता है। मंदिर की भव्य स्थापत्य शैली और नक्काशी इसे विशेष बनाती है। गर्भगृह में विराजमान काले पत्थर की श्रीकृष्ण प्रतिमा अत्यंत दिव्य और आकर्षक है। मान्यता है कि यह मंदिर द्वापर युग से अस्तित्व में है और इसे भगवान विष्णु का स्वयंभू स्थान माना जाता है।
हर साल यहाँ कार्तिक पूर्णिमा मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं। शामलाजी मंदिर आध्यात्मिक शांति और भक्तिभाव का अनुपम संगम है, जो श्रद्धालुओं को भगवान के सान्निध्य का अनुभव कराता है।
तो ये थे गुजरात के प्रसिद्ध मंदिर। जो गुजरात की खूबसूरती और भव्यता को और भी ज्यादा निखारते है। । यहाँ के मंदिर न केवल धार्मिक स्थल हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पौराणिक गाथाओं और ऐतिहासिक विरासत के जीवंत प्रमाण भी हैं। ये मंदिर न केवल भक्तों को ईश्वर से जोड़ते हैं, बल्कि शांति, शक्ति और भक्ति का अनूठा अनुभव भी कराते हैं। यही कारण है कि गुजरात को भारत की आध्यात्मिक राजधानी भी कहा जाता है, जहाँ हर मंदिर एक नई कथा, एक नया आशीर्वाद और अनंत श्रद्धा का प्रतीक है।
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