ओडिशा के प्रसिद्ध मंदिर
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ओडिशा के 11 प्रसिद्ध मंदिर

ओडिशा के सबसे खूबसूरत और प्राचीन मंदिर! कौन से हैं ये 11 प्रसिद्ध मंदिर और क्यों हैं खास? जानने के लिए आगे पढ़ें!

ओडिशा के मंदिरों के बारे में

ओडिशा, जिसे मंदिरों की भूमि कहा जाता है, यहां के प्राचीन मंदिर न केवल आध्यात्मिक शक्ति से भरपूर हैं, बल्कि अद्भुत वास्तुकला का भी उत्कृष्ट नमूना पेश करते हैं। जगन्नाथ पुरी मंदिर, जहां भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है, से लेकर कोणार्क का सूर्य मंदिर, जो अपनी भव्यता के लिए जाना जाता है। आइए जानते हैं ओडिशा के 11 प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में।

ओडिशा के 11 प्रसिद्ध मंदिर

ओडिशा को 'मंदिरों की भूमि' कहा जाता है, जहाँ हजारों वर्षों से धर्म और दर्शन के गूढ़ रहस्यों की साधना हो रही है। यहाँ के मंदिर वैष्णव, शैव और तांत्रिक परंपराओं का अद्भुत समागम प्रस्तुत करते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जहाँ वैष्णव भक्ति की अनूठी झलक मिलती है, वहीं कोणार्क का सूर्य मंदिर अद्वितीय वास्तुकला और ज्योतिषीय रहस्यों को समेटे हुए है। लिंगराज मंदिर में शिव और विष्णु की संयुक्त आराधना का दर्शन होता है, तो चौसठ योगिनी मंदिर में शक्ति की रहस्यमयी उपासना होती है।

ओडिशा की धरती वह पावन भूमि है, जहाँ न केवल मूर्तियों में देवत्व का वास है, बल्कि हर पत्थर, हर गलियारा और हर उत्सव भी दिव्यता की अनुभूति कराता है। यही कारण है कि ओडिशा सदियों से भक्तों, संतों और तीर्थयात्रियों के लिए आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

ओडिशा के 11 प्रसिद्ध मंदिर: जानें इतिहास एवं पौराणिक कथा

1. जगन्नाथ मंदिर

पुरी का जगन्नाथ मंदिर भारत के चार धामों में से एक है, यहाँ भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ रूप में अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। मंदिर की ऊँचाई 214 फीट है और मंदिर की शिखर पर मौजूद चक्र हर दिशा से एक जैसा ही दिखता है। यहाँ की अनोखी मान्यता है कि मंदिर का ध्वज हमेशा हवा के विपरीत लहराता है। यहाँ की रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है, जिसमें 56 भोग तैयार होते हैं। रथ यात्रा इस मंदिर का सबसे भव्य पर्व है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन विशाल रथों पर नगर भ्रमण करते हैं। यह मंदिर केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, भक्ति और चमत्कारों का संगम है, जहाँ दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति का विश्वास किया जाता है।

2. माँ तारा तारिणी मंदिर

ओडिशा के गंजाम जिले में स्थित माँ तारा तारिणी मंदिर देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ माँ सती का स्तन भाग गिरा था। यह मंदिर तारा और तारिणी देवी को समर्पित है, जिन्हें शक्ति और करुणा का प्रतीक माना जाता है। पहाड़ों की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर हजारों सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई के बाद दर्शन देता है, जो भक्तों की श्रद्धा और तपस्या को दर्शाता है। मान्यता है कि यहाँ देवी स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं। शक्तिपीठ होने के कारण यह तंत्र साधना का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यहाँ विशेष रूप से चैत्र नवरात्रि में भारी संख्या में भक्त मन्नतें माँगने आते हैं और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। कहा जाता है कि यहाँ की शक्ति और भक्ति का अनुभव मात्र ही, सभी दुखों का नाश कर सकता है।

3. सूर्य मंदिर, कोणार्क

ओडिशा के पुरी जिले में स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का एक अनमोल रत्न है। 13वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। जिसे विशाल सूर्य रथ के रूप में बनाया गया है, इसमें बारह जोड़ी विशालकाय पहिए और सात बलशाली घोड़े सूर्यदेव के तेज और गति का प्रतीक हैं।

मान्यता है कि इस मंदिर को इतनी दिव्य शक्ति से बनाया गया था कि सूर्योदय की पहली किरण गर्भगृह में स्थापित सूर्य प्रतिमा पर पड़ती थी। हालांकि समय के साथ मूर्ति नष्ट हो गई, लेकिन इसकी भव्यता आज भी लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है। यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल है और अपनी अद्वितीय नक्काशी, ज्यामितीय संरचना और खगोल विज्ञान से जुड़े महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यहां की मूर्तियां जीवन के विविध पहलुओं को दर्शाती हैं, जिनमें देव, मानव और पशु चित्रण शामिल हैं।

4. लिंगराज मंदिर 

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक भव्य मंदिर है, जो 11वीं शताब्दी में सोमवंशी राजा ययाति केशरी द्वारा निर्मित किया गया था। यह मंदिर कलिंग शैली की अद्भुत वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है और भुवनेश्वर को "मंदिरों का शहर" बनाने में इसकी अहम भूमिका रही है।

मंदिर में स्थित लिंगराज शिवलिंग को ‘हरिहर’ रूप में पूजा जाता है, जो शिव और विष्णु का संयुक्त स्वरूप है। मान्यता है कि इस स्थान पर स्वयं शिव प्रकट हुए थे और यहां का जल ‘विंध्य सरोवर’ में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर परिसर में 150 से अधिक छोटे-बड़े मंदिर हैं, जो इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं। इसकी ऊँची 55 मीटर की विशाल शिखर संरचना और जटिल नक्काशी इसे स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण बनाती है। लिंगराज मंदिर ओडिशा की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और भक्ति का प्रतीक है, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों को दिव्यता का अनुभव कराता है।

5. ब्रह्मेश्वर मंदिर 

भुवनेश्वर में स्थित ब्रह्मेश्वर मंदिर 9वीं शताब्दी में सोमवंशी राजा उदयता केशरी की माता कोलावती देवी द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और कलिंग शैली की उत्कृष्ट वास्तुकला का उदाहरण है। इसकी भव्यता और अलंकरण लिंगराज मंदिर से प्रेरित मानी जाती है।

मंदिर की शिखर संरचना 60 फीट ऊँची है, जो जटिल नक्काशियों और देवताओं की मूर्तियों से सजी हुई है। यहाँ शिवलिंग के साथ देवी पार्वती, कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। इस मंदिर की दीवारों पर तंत्र साधना और शैव परंपरा से जुड़े अद्भुत शिल्प उकेरे गए हैं। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ की मूर्तियाँ संगीत, नृत्य और युद्ध की झलक दिखाती हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं।

6. गुंडिचा मंदिर

ओडिशा के पुरी में स्थित गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। इसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर कहा जाता है, क्योंकि हर साल प्रसिद्ध रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा यहाँ नौ दिनों के लिए विश्राम करते हैं।

मंदिर का निर्माण गुंडिचा देवी के नाम पर हुआ था, जो गजपति राजाओं की रानी थीं। रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को उनके रथों में बैठाकर श्री मंदिर से गुंडिचा मंदिर लाया जाता है, जिसे "गुंडिचा यात्रा" कहा जाता है। यहाँ वे सात दिनों तक भक्तों को दर्शन देते हैं और फिर बहुदा यात्रा के दौरान वापस श्री मंदिर लौटते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर पवित्र स्थल है क्योंकि इसे स्वयं इंद्रद्युम्न राजा ने बनवाया था, जिनके प्रयासों से भगवान जगन्नाथ का मुख्य मंदिर भी स्थापित हुआ था। गुंडिचा मंदिर को "रथयात्रा की आत्मा" कहा जाता है। 

7. मुक्तेश्वर मंदिर 

ओडिशा में स्थित मुक्तेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक अद्भुत मंदिर है, जिसे 10वीं शताब्दी में बनाया गया था। इस मंदिर को कलिंग वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है, और इसे "मुक्ति का द्वार" कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ पूजा करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से हुआ है और इसकी सबसे खास विशेषता इसका तोरण द्वार है, जिस पर अद्भुत नक्काशी की गई है। यहाँ शिव के साथ-साथ अन्य देवताओं, अप्सराओं, साधकों और पौराणिक कथाओं के चित्रण भी देखने को मिलते हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत के दृश्य उकेरे गए हैं, जो इसे ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।

8. राम मंदिर, भुवनेश्वर 

ओडिशा में स्थित राम मंदिर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को समर्पित एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह मंदिर अपनी भव्यता, शांति और दिव्य वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण आधुनिक शैली में हुआ है, लेकिन इसकी संरचना में प्राचीन कलिंग वास्तुकला की झलक मिलती है। यहाँ भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की भव्य मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिन्हें देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। राम नवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि और दशहरा जैसे त्योहार यहाँ विशेष धूमधाम से मनाए जाते हैं। यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि भुवनेश्वर के प्रमुख आकर्षणों में से एक है, जो भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बना हुआ है।

9. अनंत वासुदेव मंदिर 

अनंत वासुदेव मंदिर, भुवनेश्वर में स्थित एक प्राचीन मंदिर है, जो भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा को समर्पित है। यह मंदिर 13वीं शताब्दी में गंग वंश के राजा भानुदेव द्वारा बनवाया गया था। मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली में बनी हुई है, जो भुवनेश्वर के अन्य मंदिरों की तरह ही उत्कृष्ट नक्काशी और भव्य शिखर से सजी है। यह मंदिर जगन्नाथ मंदिर, पुरी की तरह ही भगवान कृष्ण को अनंत वासुदेव के रूप में पूजित करता है। यहाँ प्रसाद के रूप में महाप्रसाद बनता है, जिसे पारंपरिक विधियों से तैयार किया जाता है और भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। अनंत चतुर्दशी, जन्माष्टमी और रथ यात्रा जैसे पर्व यहाँ विशेष श्रद्धा और उल्लास से मनाए जाते हैं। 

10. चौसठ योगिनी मंदिर 

चौसठ योगिनी मंदिर, ओडिशा के भुवनेश्वर से करीब 15 किलोमीटर दूर हीरापुर में स्थित एक रहस्यमयी और प्राचीन तांत्रिक मंदिर है। यह मंदिर माँ काली और तंत्र साधना से जुड़ा हुआ है और इसे 64 योगिनियों को समर्पित किया गया है।

9वीं शताब्दी में बना यह मंदिर वृत्ताकार आकार में निर्मित है, जो तंत्र परंपरा के मंदिरों की खास पहचान है। इस मंदिर में चौसठ योगिनियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं, जो शक्ति और तंत्र साधना की प्रतीक हैं। यह मंदिर छतविहीन है, जिससे यह खुला आकाश के नीचे स्थित ऊर्जा केंद्र के रूप में कार्य करता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ साधक विशेष साधनाएँ करते थे और यह स्थान रहस्यमय शक्तियों से भरा हुआ है।

11. मौसी माँ मंदिर 

मौसी माँ मंदिर ओडिशा के पुरी में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है, जो भगवान जगन्नाथ की मौसी माँ अर्धासिनी को समर्पित है। यह मंदिर गुंडिचा मंदिर और जगन्नाथ मंदिर के बीच स्थित है और रथयात्रा के दौरान इसका विशेष महत्व होता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर जाते हैं, तो वे मौसी माँ के घर में विश्राम करते हैं। यहाँ उन्हें "पोड़ा पिठा" का भोग लगाया जाता है, जिसे माँ अर्धासिनी प्रेमपूर्वक अपने भांजे को खिलाती हैं। पुरी की पावन भूमि पर स्थित यह मंदिर ममता, प्रेम और भक्ति का प्रतीक है, जो भगवान जगन्नाथ की महिमा को और अधिक उजागर करता है।

तो यह थे ओडिशा के कुछ भव्य मंदिर। भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में ओडिशा का स्थान अद्वितीय है। यह केवल एक राज्य नहीं, बल्कि सदियों से धर्म, साधना और भक्ति का जीवंत केंद्र रहा है। यहाँ के मंदिर केवल स्थापत्य कला के अद्भुत उदाहरण नहीं, बल्कि जीवंत ऊर्जा से स्पंदित शक्ति-स्थल हैं, जहाँ भक्तों की आस्था, तपस्या और श्रद्धा गहराई से जुड़ी हुई है।

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Published by Sri Mandir·March 17, 2025

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