त्रिपुरा के सबसे सुंदर और ऐतिहासिक मंदिर! कौन से हैं ये 11 प्रसिद्ध मंदिर और क्यों हैं ये खास? जानने के लिए आगे पढ़ें!
त्रिपुरा, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, धार्मिक आस्था का भी एक प्रमुख केंद्र है। यहाँ स्थित मंदिर न केवल आध्यात्मिक शक्ति से भरपूर हैं, बल्कि इनकी ऐतिहासिक और स्थापत्य कला भी अद्भुत है। चलिए जानते हैं त्रिपुरा के 11 प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में।
भारत का उत्तर-पूर्वी राज्य त्रिपुरा न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि यह अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ के मंदिर प्राचीन इतिहास, अद्भुत वास्तुकला और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम प्रस्तुत करते हैं।
माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर त्रिपुरा का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है और इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर उदयपुर में स्थित है और 1501 ईस्वी में महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा बनवाया गया था। मान्यता है कि यहाँ सती का दाहिना पैर गिरा था, जिससे यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मंदिर में काले काष्ठी पत्थर से बनी माता त्रिपुरा सुंदरी की मूर्ति स्थापित है, जो ‘सोरोशी’ के रूप में पूजी जाती हैं। मुख्य गर्भगृह में छोटी काली मूर्ति भी है जिसे ‘चोट्टो मा’ कहा जाता है। यहाँ हर साल दीवाली के दौरान विशाल मेला लगता है, जिसमें हजारों भक्त हिस्सा लेते हैं।
यहाँ का वातावरण श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र और शांतिपूर्ण होता है। कहा जाता है कि इस मंदिर में आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। मंदिर के पास ही एक सुंदर सरोवर भी स्थित है जिसे ‘कल्याण सागर’ कहा जाता है। इस सरोवर में रहने वाले कछुए और मछलियाँ श्रद्धालुओं द्वारा पूजी जाती हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु जलाशय में मछलियों को भोजन डालते हैं, जो शुभ माना जाता है।
अगरतला से लगभग 14 किमी दूर स्थित चतुर्दश देवता मंदिर का निर्माण महाराजा कृष्ण माणिक्य ने करवाया था। यह मंदिर त्रिपुरा के राजवंशों की कुलदेवताओं को समर्पित है, जिसमें 14 देवी-देवताओं की पूजा होती है। ये देवता वैदिक और आदिवासी परंपराओं के संगम का प्रतीक हैं।
हर साल जुलाई में यहाँ खारची पूजा उत्सव मनाया जाता है, जिसमें हज़ारों श्रद्धालु आते हैं। यह त्योहार हिंदू और आदिवासी संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है। इस मंदिर का स्थापत्य अत्यंत सुंदर और भव्य है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में स्थापित देवताओं का आशीर्वाद पूरे राज्य पर बना रहता है।
उदयपुर में गोमती नदी के किनारे स्थित भुवनेश्वरी मंदिर का निर्माण महाराजा गोविंद माणिक्य ने 1660-75 ईस्वी के बीच करवाया था। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी वास्तुकला बांग्ला शैली की है, जिसमें पिरामिडनुमा छतें, अलंकृत द्वार और दीवारों पर बारीक नक्काशी देखने को मिलती है।
यह मंदिर प्रसिद्ध साहित्यकार रवींद्रनाथ ठाकुर के उपन्यास ‘राजर्षि’ और नाटक ‘विसर्जन’ में भी वर्णित है, जिससे इसकी ऐतिहासिक महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। कहा जाता है कि यह मंदिर तंत्र साधना के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। यहाँ भुवनेश्वरी देवी की भव्य मूर्ति स्थापित है, जो शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती हैं।
श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र है। विशेष रूप से नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहाँ भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इसके चारों ओर का शांत वातावरण और गोमती नदी का सौंदर्य इसे ध्यान और साधना के लिए एक उपयुक्त स्थान बनाता है। मंदिर के समीप अन्य प्राचीन संरचनाएँ भी देखी जा सकती हैं, जो इस क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास को दर्शाती हैं।
त्रिपुरा का यह स्थान अत्यंत रहस्यमयी और ऐतिहासिक महत्व का है। उनाकोटी का अर्थ है ‘एक करोड़ से एक कम’। यहाँ विशाल पत्थर की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं, जिनमें भगवान शिव की 30 फीट ऊँची मूर्ति ‘उन्मीलनेश्वर महादेव’ सबसे प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यह स्थल 7वीं-9वीं शताब्दी के बीच का है और यहाँ एक तपस्वी द्वारा लाखों देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई गई थीं, लेकिन उनके आदेश न मानने के कारण वे पत्थर में बदल गए।
उनाकोटी में हर वर्ष ‘अष्टमी मेला’ का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। यह स्थान पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दक्षिण त्रिपुरा के जोलाइबाड़ी में स्थित यह पुरातात्विक स्थल 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच के हिंदू और बौद्ध धर्मों के मिश्रण का प्रतीक है। यहाँ कई मूर्तियाँ और टेराकोटा कला के नमूने मिले हैं, जो त्रिपुरा के सांस्कृतिक गौरव का प्रमाण हैं।
पिलक में कई छोटी गुफाएँ और मंदिर भी हैं जो इस स्थान की ऐतिहासिकता को और अधिक महत्वपूर्ण बनाते हैं।
चौदह देवी मंदिर त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर, पुराने अगरतला नामक स्थान में स्थित है। इस मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। इतिहास में दर्ज है कि महाराजा कृष्ण माणिक्य ने शमसेर गाजी के साथ जारी युद्ध के चलते अपनी राजधानी को उदयपुर से स्थानांतरित कर पुराने अगरतला में स्थापित किया था। यह स्थान तब तक त्रिपुरा की राजधानी बना रहा जब तक कि अंततः इसे अगरतला स्थानांतरित नहीं कर दिया गया।
यह मंदिर विशेष रूप से अपने वार्षिक खर्ची उत्सव के लिए प्रसिद्ध है, जो प्रत्येक वर्ष जुलाई माह में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु और तीर्थयात्री यहां एकत्र होते हैं और देवी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस पर्व के दौरान पूरे क्षेत्र में भव्य आयोजन किए जाते हैं, जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रमुख होते हैं।
स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, जो भी भक्त त्रिपुरा स्थित चौदह देवी मंदिर के दर्शन कर लेता है, उसे जीवन में कम से कम चौदह बार अगरतला आने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह मान्यता मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तों के विश्वास को दर्शाती है। मंदिर का शांत वातावरण, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक महत्व इसे श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष स्थान बनाते हैं।
अगरतला कमलासागर काली मंदिर का निर्माण महाराजा मानिक्य बहादुर ने 15वीं शताब्दी में कराया था और स्थानीय शासकों द्वारा इसे 17वीं शताब्दी तक पूर्ण किया गया। इस मंदिर में बलुआ पत्थर से निर्मित महिषासुरमर्दिनी देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। देवी दशभुजा दुर्गा के चरणों के नीचे महादेव विराजमान हैं, इसी कारण इसे काली मंदिर कहा जाता है।
देवी महिषासुरमर्दिनी का यह मंदिर लाल रंग का है और त्रिपुरी स्थापत्य शैली में निर्मित है। यहाँ बंगाली मंदिर स्थापत्य शैली के प्रभाव भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। गर्भगृह में बलुआ पत्थर से निर्मित देवी दशभुजा दुर्गा की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
गोमती नदी के तट पर स्थित भुवनेश्वरी मंदिर त्रिपुरा का एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है। इसका निर्माण महाराजा गोविंदा माणिक्य ने 1660-1675 ईस्वी के बीच कराया था। यह मंदिर न केवल अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि रवींद्रनाथ टैगोर के साहित्य में भी इसका विशेष स्थान है। उनके नाटक बिशारजन और उपन्यास राजर्षि में इस मंदिर का उल्लेख किया गया है।
मंदिर का स्थापत्य त्रिपुरा की विशिष्ट अभयारण्य वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण है। यह अगरतला से लगभग 55 किलोमीटर दूर, महाराजा गोविंदा माणिक्य के पुराने शाही महल के पास स्थित है। मंदिर एक ऊँचे आँगन पर निर्मित है, जिसमें प्रवेश द्वार और केंद्रीय कक्षों पर स्तूप जैसे अलंकरण देखे जा सकते हैं। इसकी छत चार-चाल शैली में बनी है, जिसे वनस्पति विषयों की नक्काशी से सजाया गया है।
उदयपुर, जो कभी माणिक्य राजवंश की राजधानी था, त्रिपुरा के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। भुवनेश्वरी मंदिर की आध्यात्मिक आभा और ऐतिहासिक विरासत इसे श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए एक अनूठा स्थल बनाती है।
जोलाईबाड़ी सूर्य मंदिर दक्षिण त्रिपुरा जिले में स्थित है। यह मंदिर सूर्य देवता को समर्पित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। त्रिपुरा की हरी-भरी पहाड़ियों और शांत वातावरण के बीच स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है।
यह सूर्य मंदिर हिंदू धर्म में सूर्य उपासना की परंपरा को दर्शाता है। इसकी वास्तुकला पारंपरिक शैली में बनी हुई है, जिसमें सूर्य देव की भव्य मूर्ति स्थापित है। मंदिर परिसर में आकर्षक नक्काशी, स्तंभ और मंडप हैं, जो इसकी स्थापत्य कला को और भी भव्य बनाते हैं।
अगरतला के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक लक्ष्मी नारायण मंदिर उज्जयंत पैलेस के मुख्य प्रवेश द्वार के पास स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा बीरेंद्र किशोर माणिक्य के शासनकाल के दौरान हुआ था, और त्रिपुरा के शाही परिवार ने इसके निर्माण में आर्थिक योगदान दिया था।
मंदिर में भगवान कृष्ण की एक सुंदर प्रतिमा स्थापित है, जिसे करीब 45 वर्ष पहले कृष्णानंद सेवायत ने यहां स्थापित किया था। मंदिर के सामने तामल वृक्ष लगाया गया है, जो भागवत पुराण में भगवान कृष्ण के जीवन से गहरे संबंध के कारण विशेष महत्व रखता है।
हर वर्ष जन्माष्टमी का पर्व यहां श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर सैकड़ों भक्त और तीर्थयात्री भगवान की पूजा-अर्चना के लिए मंदिर में एकत्र होते हैं। लक्ष्मी नारायण मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि त्रिपुरा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है।
त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में स्थित जगन्नाथ मंदिर एक प्रतिष्ठित हिंदू तीर्थस्थल है, जो भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को समर्पित है। यह भव्य मंदिर उज्जयंत पैलेस परिसर के भीतर स्थित है, जो इसकी आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक विशिष्ट बनाता है।
यह मंदिर केवल पूजा का स्थल ही नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक उत्सवों और भक्तों के लिए ध्यान एवं आत्मचिंतन का केंद्र भी है। यहां पूरे वर्ष विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव मनाए जाते हैं, जिससे यह स्थान श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए एक आध्यात्मिक आकर्षण बन जाता है।
मंदिर की उपस्थिति उज्जयंत पैलेस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में चार चाँद लगा देती है, जहाँ त्रिपुरा के समृद्ध अतीत और आध्यात्मिक परंपरा का एक सुंदर संगम देखने को मिलता है। इसकी स्थापत्य कला, आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक महत्ता इसे अगरतला के सबसे पवित्र और दर्शनीय स्थलों में से एक बनाती है।
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