हिंदू धर्म में प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह तिथि देवी दुर्गा और उनके दिव्य स्वरूपों को समर्पित मानी जाती है तथा दस महाविद्याओं की उपासना के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जब व्यक्ति जीवन में भावनात्मक थकान, निर्णयों को लेकर असमंजस और भीतर के भय से ग्रस्त हो जाता है, तब महाविद्याओं की साधना मन और चेतना को स्थिर करने का कार्य करती है। दस महाविद्याएं माँ दुर्गा के गूढ़ और तांत्रिक स्वरूप मानी जाती हैं। उनकी उपासना से साधक के भीतर जमी मानसिक थकावट, भय और भ्रम का शमन होता है तथा आत्मबल, स्पष्टता और सुरक्षा की भावना जाग्रत होती है। यह धारणा है कि महाविद्याएं केवल बाहरी बाधाओं को ही नहीं, बल्कि मन के भीतर चल रहे द्वंद्व और निर्णयहीनता को भी शांत करती हैं।
इसी उद्देश्य से इस मासिक दुर्गाष्टमी पर श्री मंदिर द्वारा पश्चिम बंगाल में स्थित शक्तिपीठ कालीघाट में पंच महाविद्या विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया जा रहा है। मान्यता है कि शक्तिपीठों में की गई देवी उपासना का प्रभाव अत्यंत तीव्र होता है और यह साधक को मानसिक स्थिरता तथा भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करती है। इस अनुष्ठान में माँ काली, माँ तारा, माँ षोडशी, माँ भुवनेश्वरी और माँ बगलामुखी की शक्ति समृद्धि महायज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न कराया जाएगा। देवी भागवत पुराण के अनुसार, महाविद्याओं की उत्पत्ति देवी सती के भीतर जागृत हुई चेतना से जुड़ी मानी जाती है। ये स्वरूप शक्ति के साथ साथ मानसिक स्पष्टता और भय से मुक्ति के प्रतीक भी हैं। पंच महाविद्याएं विशेष रूप से जीवन के मानसिक और भावनात्मक संघर्षों से उबारने वाली मानी जाती हैं।
माँ काली नकारात्मकता और भीतर जमे भय का नाश करती हैं। माँ तारा भ्रम और मानसिक अंधकार से बाहर निकलने का मार्ग दिखाती हैं। माँ षोडशी भावनात्मक संतुलन और स्थिरता प्रदान करती हैं। माँ भुवनेश्वरी जीवन को व्यापक दृष्टि से समझने की शक्ति देती हैं। माँ बगलामुखी भय, असुरक्षा और मानसिक अशांति को शांत करने में सहायक मानी जाती हैं। यदि आप भी भावनात्मक थकान, जीवन के निर्णयों में भ्रम और आंतरिक भय से राहत चाहते हैं, तो इस दुर्गाष्टमी श्री मंदिर के माध्यम से इस पंच महाविद्या विशेष अनुष्ठान में सहभागी बनकर देवी शक्ति का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करें।