🕉️ महाशिवरात्रि केवल एक त्योहार नहीं मानी जाती, बल्कि यह वह पवित्र रात्रि मानी जाती है जब भगवान शिव की दिव्य ऊर्जा पृथ्वी के बहुत निकट अनुभव की जाती है। वर्ष 2026 में यह शुभ दिन रविवार को पड़ रहा है, जिसे सूर्य देव का दिन माना जाता है और आत्मिक प्रकाश के जागरण से जोड़ा जाता है। इस बार ग्रहों की स्थिति भी ध्यान और साधना के लिए विशेष रूप से अनुकूल मानी जा रही है। महाशिवरात्रि की रात जब अधिकतर लोग विश्राम कर रहे होते हैं, तब निशित काल, अर्थात आधी रात का समय, प्रार्थना और ध्यान के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। परंपरा के अनुसार यही वह समय है जिसे लिंगोद्भव से जोड़ा जाता है, जब निराकार शिव अनंत ज्योति स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और सृष्टि को शांति और ज्ञान का संदेश दिया।
🕉️ शास्त्रों में एक कथा मिलती है कि एक समय देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि सबसे श्रेष्ठ कौन है। तब देवों के देव महादेव अनंत अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु ने उस ज्योति का आरंभ और अंत खोजने का प्रयास किया, पर वे उसे पा नहीं सके। ऐसा माना जाता है कि यह कथा हमें यह समझाने के लिए है कि शिव ही सृष्टि के आदि और अंत हैं। महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में किया गया अभिषेक इसी दिव्य घटना की स्मृति से जुड़ा हुआ माना जाता है। जैसे उस दिव्य प्रकाश से देवताओं को शांति का अनुभव हुआ, वैसे ही भक्त भी अपने मन के भ्रम और चिंताओं को शांत करने की भावना से पूजा करते हैं।
🕉️ श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में इस विशेष निशित काल पूजा को श्रद्धा और प्राचीन परंपराओं के अनुसार किया जाता है। इस समय शिवलिंग का पंचामृत और पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। बेल पत्र, चंदन और अन्य पूजन सामग्री मन की शांति और परिवार के मंगल की भावना से अर्पित की जाती हैं। रात्रि की शांति में जब मंत्रों का उच्चारण होता है, तब ऐसा माना जाता है कि साधक अपने भीतर नई सकारात्मकता और स्थिरता का अनुभव कर सकता है। यह पूजा भगवान शिव को हृदय में स्मरण करने और जीवन की कठिनाइयों में आंतरिक शक्ति पाने की भावना से की जाती है।
श्री मंदिर के माध्यम से की जाने वाली यह विशेष पूजा, भक्तों को साधना में गहराई लाने और दिव्य स्मरण से जुड़ने का एक पावन अवसर बन सकती है, इस मौके को जानें न दें।