सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। यह समय पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए किए जाने वाले सभी अनुष्ठानों के लिए सबसे शुभ माना गया है। शास्त्रों की मानें तो पितृ पक्ष की अवधि के दौरान हमारे पूर्वज पितृ लोक से धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से खुश होकर आशीर्वाद देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली हर तिथि का अपना अलग विशेष महत्व है, जिसमें से एक है पंचमी तिथि। इस तिथि पर उन पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं, जिनकी मृत्यु किसी भी मास की पंचमी तिथि पर हुई हो। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, यदि पितरों का ठीक प्रकार से श्राद्ध न किया जाए तो उनके वंशजों को पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है। पितृदोष जीवन में आर्थिक परेशानी, मानसिक तनाव, कष्ट और जीवन में देरी का कारण बनता है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध पंचमी तिथि पर पितृ दोष शांति महापूजा करने से पितृ दोष से राहत पायी जा सकती है।
यदि यह पूजा किसी धार्मिक स्थान पर की जाए तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। हरिद्वार में गंगा घाट पितृ कर्मकांड के लिए पूजनीय स्थल हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान राम के पूर्वज राजा भगीरथ ने भी अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए मां गंगा की तपस्या की थी। ऐसा कहा जाता है कि पवित्र गंगा नदी के तट पर पितृ दोष पूजा करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलता है। माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति हरिद्वार के गंगा घाट में पितृ दोष शांति महापूजा करता है तो उसके पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होता है और व्यक्ति को जीवन में विलंब और बाधाओं पर विजय पाने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए श्राद्ध पंचमी तिथि पर हरिद्वार में गंगा घाट पर पितृ दोष शांति महापूजा का आयोजन किया जा रहा है। श्री मंदिर के माध्यम से इस पूजा में भाग लें। इसके अलावा, पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए दान पुण्य करने का भी विधान है। मान्यता है कि इस समय दान करने से दोगुने फल की प्राप्ति होती है, जिनमें पितृ पक्ष विशेष पंच भोग, दीप दान भी शामिल है। इसलिए इस पूजा के साथ अतिरिक्त विकल्प के रूप में दिए गए जैसे पंच भोग, दीप दान एवं गंगा आरती का चुनाव करना आपके लिए फलदायी हो सकता है। इसलिए इस पूजा में इन विकल्पों को चुनकर अपनी पूजा को और भी अधिक प्रभावशाली बनाएं।