
क्या आप जानते हैं पापांकुशा एकादशी 2026 कब है? जानिए इस व्रत की तिथि, पूजा विधि, मुहूर्त, महत्व और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का रहस्य – सब कुछ एक ही जगह!
पापांकुशा एकादशी हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत में उपवास, दान, जप और भक्ति का विशेष महत्व होता है।
आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी दशहरे के ठीक दूसरे दिन आती है और सनातन परंपरा में इसका विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत भगवान श्री विष्णु को समर्पित होता है और पापांकुशा एकादशी को इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान के साथ भगवान श्री विष्णु का पूजन और व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से जुड़े सभी पाप और दोष नष्ट हो जाते हैं। साथ ही, श्री हरि की कृपा से उसे सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा जीवन में खुशहाली बनी रहती है।
वैदिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पापांकुशा एकादशी का व्रत गुरुवार, 22 अक्टूबर को रखा जाएगा। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है और पापांकुशा एकादशी का व्रत विशेष रूप से पापों से मुक्ति और पुण्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
पापांकुशा एकादशी आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में पापांकुशा एकादशी का व्रत बृहस्पतिवार, 22 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा।
एकादशी तिथि का प्रारंभ: 21 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:11 बजे
एकादशी तिथि की समाप्ति: 22 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:47 बजे
पारण (व्रत तोड़ने) का शुभ समय: 23 अक्टूबर 2026 को प्रातः 06:27 बजे से 08:42 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त होने का समय: 23 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:35 बजे
ध्यान दें: पारण हमेशा द्वादशी तिथि के भीतर ही करना चाहिए। हरि वासर (एकादशी तिथि का अंतिम भाग) के दौरान व्रत तोड़ना वर्जित माना गया है। साथ ही, द्वादशी तिथि समाप्त होने के बाद पारण करना भी शास्त्रसम्मत नहीं है।
सनातन धर्म में पापांकुशा एकादशी का विशेष महत्व है। महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था कि यह तिथि पापों पर अंकुश लगाती है और मनुष्य को पापकर्मों से रक्षा प्रदान करती है।
इस एकादशी का व्रत करने से धर्म, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा जीवन में संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्री विष्णु की पूजा करने और ब्राह्मणों व जरूरतमंदों को दान देने से विशेष पुण्य मिलता है। फलाहार करने से शरीर स्वस्थ और मन पवित्र रहता है।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पापांकुशा एकादशी के समान कोई अन्य व्रत नहीं है। यह व्रत हजार अश्वमेघ और सौ सूर्य यज्ञ के समान पुण्य फल प्रदान करता है। पद्म पुराण में बताया गया है कि इस दिन दान और रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और यमराज के भय से मुक्ति मिलती है।
पापांकुशा एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से अनेक अश्वमेघ और सूर्य यज्ञों के समान फल की प्राप्ति होती है। इसी कारण पापांकुशा एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर सभी पापों का नाश होता है और भगवान श्री विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
पापांकुशा एकादशी भगवान श्री विष्णु को समर्पित अत्यंत पुण्यदायी व्रत है। इस दिन किए गए उपाय जीवन के पापों से मुक्ति दिलाते हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि करते हैं।
प्राचीन काल की बात है। विंध्य पर्वत क्षेत्र में क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। वह स्वभाव से अत्यंत क्रूर था और उसका संपूर्ण जीवन हिंसा, लूटपाट, मद्यपान तथा कुसंगति जैसे पापकर्मों में ही व्यतीत हुआ। उसने कभी धर्म या पुण्य का मार्ग नहीं अपनाया।
जब उसका जीवन अंतिम चरण में पहुँचा, तब यमराज के दूत उसे लेने आए। यमदूतों ने बहेलिये से कहा कि अगले दिन उसका अंतिम समय है और वे उसे लेने पुनः आएँगे। यह सुनकर वह भय से काँप उठा। मृत्यु के भय और अपने पापों का स्मरण करते हुए वह तुरंत महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचा और उनके चरणों में गिरकर करुणा भरी प्रार्थना करने लगा।
बहेलिये ने कहा—“हे ऋषिवर! मैंने जीवन भर केवल पाप ही किए हैं। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे सभी पाप नष्ट हो जाएँ और मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो सके।” उसकी दीन अवस्था देखकर महर्षि अंगिरा ने उस पर करुणा की और उसे आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का विधि-विधान से व्रत करने का उपदेश दिया।
महर्षि के आदेश का पालन करते हुए बहेलिये ने पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ पापांकुशा एकादशी का व्रत और भगवान श्री विष्णु की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से उसके जीवन के सभी संचित पाप नष्ट हो गए और उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त हुई।
जब अगले दिन यमदूत उसे लेने आए, तो उन्होंने देखा कि बहेलिया भगवान की कृपा से विष्णु लोक को प्रस्थान कर चुका है। यह अद्भुत दृश्य देखकर यमदूत बिना उसे लिए ही यमलोक लौट गए। इस प्रकार पापांकुशा एकादशी के व्रत ने एक पापी को भी मोक्ष का अधिकारी बना दिया।
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