रमा एकादशी कब है
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रमा एकादशी कब है

क्या आप जानते हैं रमा एकादशी 2026 कब है? जानिए इस व्रत की तिथि, पूजा विधि, मुहूर्त, महत्व और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का रहस्य – सब कुछ एक ही जगह!

रमा एकादशी के बारे में

रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एक पवित्र एकादशी है। इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। यह व्रत मोक्ष की प्राप्ति का भी मार्ग प्रशस्त करता है।

रमा एकादशी क्या है?

रमा एकादशी हिन्दू धर्म की एक अत्यंत पवित्र एकादशी है, जो माता लक्ष्मी के रमा स्वरूप के नाम पर जानी जाती है। इस दिन महालक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु के पूर्णावतार केशव स्वरूप की पूजा की जाती है। यह एकादशी चातुर्मास की अंतिम एकादशी मानी जाती है, इसलिए इसका विशेष धार्मिक महत्व है।

रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व दिवाली से ठीक पहले आता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में सुख-समृद्धि, धन-वैभव और शांति की प्राप्ति होती है तथा सभी पापों का नाश होता है।

इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, फलाहार करते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। रमा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का उत्तम साधन माना जाता है।

रमा एकादशी कब है: जानें शुभ मुहूर्त

रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में रमा एकादशी का व्रत बृहस्पतिवार, 5 नवम्बर 2026 को रखा जाएगा।

  • एकादशी तिथि का प्रारंभ: 4 नवम्बर 2026 को प्रातः 11:03 बजे
  • एकादशी तिथि की समाप्ति: 5 नवम्बर 2026 को प्रातः 10:35 बजे
  • पारण (व्रत तोड़ने) का शुभ समय: 6 नवम्बर 2026 को प्रातः 06:37 बजे से 08:48 बजे तक
  • द्वादशी तिथि समाप्त होने का समय: 6 नवम्बर 2026 को प्रातः 10:30 बजे

इस प्रकार भक्तजन निर्धारित शुभ मुहूर्त में व्रत रखकर पारण कर सकते हैं और रमा एकादशी का पूर्ण पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

रमा एकादशी का धार्मिक महत्व

पद्म पुराण के अनुसार रमा एकादशी का व्रत बहुत ही फलदायी माना गया है। इस व्रत का फल कामधेनु और चिंतामणि के समान बताया गया है। रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है और यह दीपावली से लगभग चार दिन पहले मनाई जाती है। इसे रंभा या रम्भा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। सच्चे मन से इस व्रत को करने पर वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है, इसलिए इसे अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण एकादशी माना गया है।

यह एकादशी भगवान श्री विष्णु को सबसे अधिक प्रिय है। पद्म पुराण में बताया गया है कि जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ इस दिन व्रत-उपवास करता है, उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।

व्रत और पूजा विधि

  • रमा एकादशी के व्रत के नियम दशमी तिथि से ही शुरू हो जाते हैं। दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और मन को शुद्ध रखना चाहिए।
  • रमा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
  • घर के मंदिर में दीप जलाएं और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की श्रद्धा से पूजा करें।
  • भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पीले फूल, तुलसी के पत्ते, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
  • भोग में तुलसी जरूर रखें, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते। इस दिन केवल सात्विक भोजन का ही भोग लगाएं।
  • यदि संभव हो तो पूरे दिन व्रत या उपवास रखें। पूजा के बाद भगवान की आरती करें और उनके मंत्रों का जाप करें। दिनभर भगवान का ध्यान करें।
  • रात में भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें और जागरण करें। अगले दिन द्वादशी तिथि को फिर से पूजा करें।
  • इसके बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं, अन्न, वस्त्र और दान-दक्षिणा दें। अंत में स्वयं भोजन करके व्रत का पारण करें।

रमा एकादशी के उपाय और लाभ

रमा एकादशी के उपाय

  • रमा एकादशी के दिन श्रद्धा और नियम के साथ व्रत रखें। यदि पूर्ण व्रत संभव न हो तो फलाहार करें।
  • सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की पूजा करें। उन्हें तुलसी दल, पीले फूल, धूप, दीप और फल अर्पित करें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। इससे मन शांत होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
  • इस दिन तुलसी जी की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। दीप जलाकर परिक्रमा करें।
  • रात में भगवान विष्णु का स्मरण, भजन और कथा सुनें। इससे व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
  • द्वादशी के दिन अन्न, वस्त्र, धन या जरूरत की वस्तुएँ गरीबों या ब्राह्मणों को दान करें।

रमा एकादशी के लाभ

  • इस व्रत से जीवन के सभी पाप कर्म समाप्त होते हैं।
  • माता लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक परेशानियाँ दूर होती हैं।
  • परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
  • यह एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
  • मान्यता है कि सच्चे मन से व्रत करने वाले को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
  • मानसिक तनाव, कष्ट और बाधाएँ दूर होती हैं।

रमा एकादशी की पौराणिक कथा

प्राचीन समय में मुचुकुंद नाम के एक महान राजा थे। वे सत्यवादी, धर्मपरायण और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनकी पुत्री का नाम चंद्रभागा था। उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से हुआ था।

एक बार शोभन अपनी पत्नी के साथ ससुराल आया। कुछ ही दिनों बाद रमा एकादशी आने वाली थी। राजा मुचुकुंद ने पूरे नगर में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी के दिन कोई भी व्यक्ति भोजन नहीं करेगा। यह सुनकर शोभन बहुत घबरा गया, क्योंकि वह बिना भोजन के नहीं रह सकता था। उसने अपनी पत्नी चंद्रभागा से यह बात कही।

तब चंद्रभागा ने समझाया कि इस नगर में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी भी एकादशी का व्रत रखते हैं। यदि आप भोजन करना चाहते हैं तो नगर छोड़कर कहीं और चले जाएँ, नहीं तो आपको भी व्रत रखना होगा। यह सुनकर शोभन ने कहा कि वह भी व्रत करेगा और जो भाग्य में होगा, वही स्वीकार करेगा।

शोभन ने पूरी श्रद्धा से एकादशी का व्रत रखा। व्रत के कारण उसे बहुत कमजोरी हो गई। रात्रि जागरण के समय उसकी तबीयत और बिगड़ गई और सुबह होने से पहले उसकी मृत्यु हो गई। उसका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कर दिया गया। पिता की आज्ञा मानकर चंद्रभागा अपने मायके में ही रहने लगी।

कुछ समय बाद राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत गए। वहाँ उन्होंने देखा कि रमा एकादशी के पुण्य प्रभाव से शोभन को एक सुंदर और धन-धान्य से भरपूर देवपुरी प्राप्त हुई है। राजा ने लौटकर यह बात अपनी पुत्री चंद्रभागा को बताई। यह सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुई।

इसके बाद चंद्रभागा ने भी रमा एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के पुण्य से वह भी अपने पति शोभन के पास पहुँच गई। इस प्रकार रमा एकादशी के व्रत की महिमा प्रकट हुई।

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Published by Sri Mandir·January 8, 2026

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