क्या आप जानते हैं? राधा अष्टमी पर इस कथा को सुनने से मिलती है असीम कृपा! जानें पूरी कहानी यहाँ।
गोलोक धाम में राधा श्रीकृष्ण के साथ निवास करती थीं। एक बार जब राधा गोलोक में नहीं थीं, तब श्रीकृष्ण अपनी सखी विरजा के साथ विहार कर रहे थे। जब राधा जी को इस बात का पता चला, तो वे क्रोधित हो गईं और तुरंत श्रीकृष्ण के पास पहुंचकर उन्हें उलाहना देने लगीं। इस घटना को देखकर श्रीकृष्ण के मित्र श्रीदामा ने राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दे दिया। राधा जी के इस क्रोध को देखकर विरजा वहां से नदी के रूप में चली गईं। शापित राधा जी ने भी श्रीदामा को राक्षस कुल में जन्म लेने का शाप दे दिया। इस शाप के परिणामस्वरूप, श्रीदामा शंखचूड़ राक्षस के रूप में जन्मे, जो भगवान विष्णु का अनन्य भक्त बना। वहीं देवी राधा वृषभानु जी की पुत्री के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुईं, लेकिन वे देवी कीर्ति के गर्भ से नहीं जन्मीं। जब राधा और श्रीदामा ने एक-दूसरे को शाप दिया, तो श्रीकृष्ण ने राधा से कहा कि तुम्हें पृथ्वी पर वृषभानु जी और देवी कीर्ति की पुत्री के रूप में जन्म लेना होगा। वहां तुम्हारा विवाह रायाण नामक वैश्य से होगा, जो वास्तव में मेरा अंशावतार होगा। पृथ्वी पर भी तुम मेरी प्रिया बनकर रहोगी, लेकिन उस रूप में हमें विछोह का दर्द सहना पड़ेगा। इसके बाद, देवी कीर्ति गर्भवती हुईं और प्रसव के समय योगमाया की प्रेरणा से वायु का प्रवेश हुआ, और उसी समय देवी राधा कन्या के रूप में प्रकट हुईं।
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