जानिए बिहार में कब है छठ पूजा? और आस्था का ये महापर्व क्यों मनाया जाता है?
आस्था के महापर्व छठ के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपको चैती छठ पूजा के बारे में पता है? दरअसल, छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है—कार्तिक छठ और चैती छठ। दोनों अलग-अलग होती है। तो अगर आप जानना चाहते हैं चैत्र माह में मनाया जाने वाले चैती छठ पूजा के बारे में क्या होती है इसका महत्वता, पूजा और विधि आदि तो पढ़िए हमारे इस आर्टिकल को और जानें सब कुछ।
छठ पूजा बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड समेत भारत के कई हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख लोकपर्व है। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। एक बार चैत्र मास में, जिसे चैती छठ कहा जाता है और दूसरी बार कार्तिक मास में, जिसे कार्तिकी छठ के नाम से जाना जाता है। चैती छठ को सूर्य षष्ठी व्रत भी कहते हैं। इस साल चैती छठ पूजा 1 अप्रैल से 4 अप्रैल तक मनाई जाएगी। यह पर्व चार दिनों तक चलता है और श्रद्धालु इस दौरान कठोर व्रत रखते हैं। चैती छठ में व्रती सूर्योदय और सूर्यास्त के समय भगवान सूर्य की उपासना करते हैं। माना जाता है कि सूर्य देव और छठी मैया की आराधना करने से भक्तों को निरोगी काया, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है। इस पर्व के दौरान व्रती गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों में स्नान कर खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य जैसी विधियों का पालन करते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि प्रकृति और परिवार के प्रति समर्पण का प्रतीक भी है।
चैती छठ पूजा सूर्य उपासना का एक पवित्र पर्व है। इस पूजा में भक्त भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना करते हैं, जिससे सुख, समृद्धि और निरोगी जीवन की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता है कि सूर्योपासना से रोग, कष्ट और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
यह चार दिवसीय त्योहार है जो हिंदू चंद्र कैलेंडर माह कार्तिक के छठे दिन को चिह्नित करता है। यह शुभ अवसर मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है।
छठ पूजा चार दिनों तक चलता है और इसमें कई अनुष्ठान शामिल होते हैं-
नहाय-खाय : इस दिन व्रती महिलाएं पवित्र स्नान करती हैं और सात्विक भोजन करती हैं।
लोहंजा/खरना : इस दिन व्रती महिलाएं निर्जला व्रत रखना शुरू करती हैं और विशेष भोजन बनाया जाता है।
संध्या अर्घ्य : इस दिन सूर्यास्त के समय नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है।
उषा अर्घ्य : इस दिन सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है और व्रत खोला जाता है।
बिहार से छठ पूजा का इतिहास जुड़ा है। मान्यताओं के अनुसार, बिहार में छठ पूजा की परंपरा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। द्रौपदी और पांडवों ने छठ पूजा का व्रत रखा था। उन्होंने अपना राज्य वापस पाने के लिए यह व्रत किया था। जब पांडव सारा राजपाठ जुए में हार गए तो द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को सब कुछ वापस मिल गया। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की पूजा करना फलदायी माना जाता है।
यदि नि:संतान महिलाएं यह पूजा करती हैं तो उन्हें संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। कथाओं के अनुसार, छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में बिहार राज्य में हुई थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्यपुत्र कर्ण बिहार के मुंगेर जिले के रहने वाले थे। यह तथ्य इस बात का प्रमाण देता है कि छठ पूजा की शुरुआत बिहार के मुंगेर जिले से हुई और आज भी यह पर्व बिहार के जिले में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने करवाया था। छठ पूजा के समय यहां बहुत बड़ा मेला लगता है। औरंगाबाद स्थित देव सूर्य मंदिर में छठ पूजा का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, माता सीता ने सबसे पहले यहां गंगा किनारे छठ पूजा की थी। आज भी यहां माता सीता के चरण चिह्न मौजूद हैं।
यह मंदिर अपनी भव्यता और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यहां के तालाब में छठ पूजा करने के लिए बिहार के साथ-साथ झारखंड और उत्तर प्रदेश से भी लोग आते हैं।
गया में फलगु नदी के किनारे छठ पूजा का विशेष महत्व है। यहां लोग पिंडदान के साथ-साथ छठ पूजा भी करते हैं
भागलपुर में गंगा नदी के किनारे छठ पूजा का आयोजन किया जाता है। यहां का छठ घाट काफी प्रसिद्ध है।
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