मेष संक्रांति 2025 में कब है? इस साल का विशेष समय कब है और क्यों है यह दिन इतना खास? जानें तिथि, महत्व और कैसे इस दिन का लाभ उठाकर आप अपना जीवन बेहतर बना सकते हैं।
मेष संक्रांति हिंदू नववर्ष का प्रारंभ और सौर वर्ष का पहला दिन होता है। इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जिससे खरमास समाप्त होता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। इसे विभिन्न राज्यों में बैसाखी, पोइला बोइशाख, विशु आदि के रूप में मनाया जाता है।
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार मेष संक्रांति हिन्दू वर्ष की पहली संक्रांति होती है। पूरे वर्ष में 12 मास की तरह ही 12 संक्रांति होती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्यदेव के एक राशि से दूसरी राशि में गोचर अर्थात प्रवेश की तिथि को संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है।
इस माह 14 अप्रैल 2025, सोमवार को सूर्य मीन राशि से निकल कर मेष राशि में गोचर करेंगे। आइये जानते हैं मेष संक्रांति के शुभ मुहूर्त -
मुहूर्त | समय |
ब्रह्म मुहूर्त | 04:06 ए एम से 04:51 ए एम तक |
प्रातः सन्ध्या | 04:29 ए एम से 05:36 ए एम तक |
अभिजित मुहूर्त | 11:33 ए एम से 12:24 पी एम तक |
विजय मुहूर्त | 02:06 पी एम से 02:57 पी एम तक |
गोधूलि मुहूर्त | 06:19 पी एम से 06:42 पी एम तक |
सायाह्न सन्ध्या | 06:20 पी एम से 07:28 पी एम तक |
अमृत काल | 02:18 पी एम से 04:07 पी एम तक |
निशिता मुहूर्त | 11:35 पी एम से 12:20 ए एम, (15 अप्रैल) तक |
साल के प्रत्येक महीने में आने वाली संक्रांति का अपना विशेष महत्व होता है। मेष संक्रांति भी उन्हीं में से एक है, जो हिन्दू धर्म की प्रमुख तिथि मानी जाती है।
चलिए जानते हैं,
हिन्दू कैलेंडर में मेष संक्रांति को वर्ष में आने वाली पहली संक्रांति माना जाता है। हर माह सूर्य देवता अपना स्थान परिवर्तन कर एक नई राशि में प्रवेश करते हैं। इसी तरह वैशाख माह में सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेंगे, जिसे मेष संक्रांति के नाम से मनाया जाएगा। मेष संक्रांति को खरमास/मलमास के अंत के रूप में देखा जाता है, इसीलिए इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है।
हिंदू शास्त्रों में मेष संक्रांति बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। इस दिन व्रत रखना, सूर्यदेव की पूजा अर्चना करना और दान करना अत्यंत फलदाई होता है। कई अन्य भारतीय कैलेंडर जैसे कि तमिल, बंगाली, ओड़िआ, पंजाबी मलयालम आदि में नए साल का पहला दिन मेष संक्रांति को ही माना जाता है। यह भी मान्यता है कि मेष संक्रांति के दिन सूर्य की उत्तरायण यात्रा पूरी होती है। मीन संक्रांति से खरमास/मलमास शुरू होकर मेष संक्रांति पर ख़त्म होता है, इसलिए मेष संक्रांति से शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जा सकती है।
इस दिन प्रातःकाल स्नान के उपरांत सूर्य भगवान को जल अर्पित करने एवं सूर्य मंत्रों का जाप करने से अक्षय पुण्यफल की प्राप्ति होती है। इस संक्रांति पर भगवान मधुसूदन की पूजा से मनवांछित फल मिलता है, एवं जीवनभर उनका आशीर्वाद बना रहता है। मेष संक्रांति पर भगवान सूर्य की अराधना करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है। इस दिन गौ माता को भरपेट चारा खिलाने से धनधान्य व सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मेष संक्रांति के पुण्यकाल में स्नान-दान, पितरों का तर्पण आदि करने से घर परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।
तो ये थी मेष संक्रांति के महत्व एवं लाभ से जुड़ी जानकारी। इस पर्व की पूजा विधि सहित इस दिन से जुड़ी अन्य जानकारियों के लिए जुड़े रहिये श्री मंदिर के साथ!
हिन्दू कैलेंडर की पहली संक्रांति मेष संक्रांति होती है। इस दिन सूर्य अपनी उत्तरायण यात्रा पूरी करके मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस संक्रांति पर पूरी सृष्टि में ऊर्जा के स्रोत माने जाने वाले भगवान सूर्य की विधि-विधान से पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन पूजा के बाद दान-पुण्य करने से व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि का वास होता है।
तो यह थी मेष संक्रांति की पूजा विधि, आप भी इस दिन सूर्यदेव की भक्ति से अपने दिन को मंगलकारी बना सकते हैं, ऐसी ही अन्य पूजा विधियों को जानने के लिए आप श्री मंदिर के साथ बनें रहें।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य का किसी राशि में प्रवेश करना संक्रांति कहलाता है। इस प्रकार सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने को मेष संक्रांति कहते हैं। इस संक्रांति से मलमास या खरमास का भी समापन भी होता है, इसलिए इस दिन जहां सूर्य देव की पूजा अर्चना करने से अनेकों फल प्राप्त होते हैं, वहीं कुछ ऐसे कार्य हैं, जिन्हें मेष संक्रांति में करना वर्जित माना जाता है।
ये थी मेष संक्रांति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी। इसी ही धार्मिक जानकारियों के लिए जुड़े रहिए 'श्री मंदिर' पर।
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