पंगुनी उथिरम् 2025 की तिथि, पूजा विधि और महत्व जानें। इस विशेष अवसर पर धार्मिक विधियों के बारे में जानकर पाएं समृद्धि और आशीर्वाद।
पंगुनी उथिरम एक महत्वपूर्ण तमिल हिंदू पर्व है, जिसे तमिल महीने पंगुनी (मार्च-अप्रैल) की उथिरम् नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। यह दिन भगवान शिव, पार्वती, कार्तिकेय, विष्णु और अन्य देवताओं से संबंधित शुभ घटनाओं के लिए प्रसिद्ध है। आइये जानते हैं इसके बारे में...
विविधताओं से परिपूर्ण भारत में अलग-अलग प्रांत अलग-अलग धर्म के लोग अपनी आस्था के अनुरूप भिन्न-भिन्न व्रत व पर्व मनाते हैं। लेकिन सबका उद्देश्य एक ही होता है, ईश्वर की आराधना करके अपना जन्म सफल करना। ऐसा ही एक पर्व है पंगुनी उथिरम्, जो कि दक्षिण भारत में मनाया जाता है। ये पर्व भगवान शिव, भगवान विष्णु और विशेष रूप से भगवान मुरुगन को समर्पित होता है।
पंगुनी उथिरम् का त्यौहार तमिल हिंदुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. स्कंद पुराण के अनुसार, आठ महाव्रतों में पंगुनी उथिरम् सबसे कल्याणकारी व्रत माना जाता है। पंगुनी महीने की पूर्णिमा के दिन ये उपवास रखा जाता है। तमिल भाषी क्षेत्रों में यह त्योहार तीन दिनों तक बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जब नक्षत्र उथिरम या उत्तरा फाल्गुनी प्रबल होता है, और पूर्णिमा तिथि होती है, तब पंगुनी उथिरम् का त्यौहार मनाया जाता है। आपको बता दें कि पंगुनी तमिल कैलेंडर का बारहवां एवं आखिरी महीना होता है। इसके बाद तमिल नववर्ष की शुरुआत होती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, पंगुनी उथिरम् के दिन भगवान मुरुगन यानि सुब्रमण्यम के साथ इंद्रदेव की बेटी देवसेना या देवयानई का विवाह हुआ था। इसीलिए इस दिन को विशेष माना जाता है।
जयंतिपुरा महात्मय में प्रचलित एक कथा के अनुसार, देवयानई और वल्ली दो सगी बहनें थीं, जो भगवान मुरुगन से विवाह करने की इच्छा रखती थीं। बाल्यकाल में उनका नाम अमृता वल्ली और सुंदरवल्ली था, परंतु बाद में वो देवसेना एवं वल्ली के रूप में जानी जाने लगीं। इसके पश्चात्, उन्हें दो अलग-अलग व्यक्तियों ने गोद ले लिया और वो एक-दूसरे से बिछड़ गईं। कहा जाता है कि एक बेटी को भगवान इंद्र ने गोद लिया था, और दूसरी को एक आदिवासी राजा ने लिया था। जब भगवान मुरुगन ने असुरों का वध किया, तो इससे भगवान इंद्र अत्यंत प्रसन्न हुए, और अपनी बेटी देवयानई का भगवान मुरुगन से विवाह करा दिया। बाद में गणेश भगवान की सहायता से मुरुगन ने वल्ली से भी विवाह कर लिया।
इस दिन को भगवान महादेव एवं पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाने की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि पंगुनी उथिरम् पर्व पर ही कांचीपुरम में ये दिव्य विवाह संपन्न हुआ था।
ऐसा माना जाता है कि इस दिन अधिकांश दिव्य विवाह हुए थे। देवी सीता और भगवान राम का विवाह भी पंगुनी उथिरम् के दिन ही हुआ था।
पंगुनी उथिरम् के इस पर्व को महालक्ष्मी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि एक मान्यता के अनुसार, इसी दिन देवी महालक्ष्मी ने महासागर के मंथन के दौरान पृथ्वी पर अवतार लिया था।
इस दिन को भगवान अय्यप्पन जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान अय्यप्पन का जन्म भगवान विष्णु के स्त्री रूप भगवान शिव और मोहिनी के मिलन के कारण हुआ था।
भगवान मुरुगन के भक्त इस दिन मंदिर जाकर उनकी आराधना करते हैं। कई भक्त इस दिन मुरुगन के मंदिर तक पैदल यात्रा करते हैं, जो तीन से चार दिनों में 100 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं।
पंगुनी उथिरम् पर्व पर भगवान मुरुगन को कावड़ियां चढ़ाई जाती हैं। इस यात्रा में भक्त अपने साथ दूध से भरे पात्र, पवित्र जल व पुष्प लेकर जाते हैं, और उसी से भगवान की पूजा करते हैं।
पंगुनी उत्सव चेन्नई शहर के मायलापुर में दस दिनों तक मनाया जाता है। यहां दस दिन पूर्व ही उत्सव का आरंभ हो जाता है, जो पूर्णिमा के दिन तक चलता है।
पंगुनी उथिरम् के समय एक दिव्य विवाह समारोह भी आयोजित किया जाता है, जिसे थिरुकल्याणम कहते हैं। यह उत्सव मुख्य रूप से तमिलनाडु और केरल में स्थित अयप्पा मंदिरों में मनाया जाता है।
इस दिन भगवान मुरुगन के भक्त कल्याणम् व्रत का पालन करते हैं, और प्रातःकाल शीघ्र स्नान करने के पश्चात् उपवास का आरंभ करते हैं। कुछ लोग ये व्रत दिन भर निराहार रहकर करते हैं, तो कुछ लोग एक बार भोजन कर उपवास रखते हैं। ये सब अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर व्रत रखते हैं।
तो भक्तों, ये थी पंगुनी उथिरम् जुड़ी संपूर्ण जानकारी। हमारी कामना है कि आपका ये व्रत सफल हो, और आपके ईष्ट देव कृपा आप पर सदैव बनी रहे। ऐसे ही व्रत, त्यौहार से जुड़ी धार्मिक जानकारियां निरंतर पाते रहने के लिए जुड़े रहिए 'श्री मंदिर' पर।
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