महाविद्या की कथा- कौन है महाविद्या, क्या है महाविद्या
महाविद्या की कथा- कौन है महाविद्या, क्या है महाविद्या

महाविद्या की कथा- कौन है महाविद्या, क्या है महाविद्या

ऐसे हुई महाविद्याओं की उत्पत्ति!


दस महाविद्याओं की कथा (Story Of Ten Mahavidyas)



शारदीय नवरात्र के दौरान देवी दुर्गा की अंगभूता दस महाविद्याओं की साधना वही साधक करते हैं, जो तंत्र-मंत्र और गुप्त विद्याओं पर सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं। अघोरी, साधु और तंत्र-मंत्र के साधक महाविद्याओं के अनन्य भक्त होते हैं, और इनकी साधना से उन्हें अचूक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि गुप्त नवरात्रि में इन सभी देवियों की गुप्त रूप से आराधना करने पर जातक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।देवी पूजन का ये पावन पर्व साल में चार बार आता है, जिसमें पहली नवरात्रि चैत्र मास के शुक्लपक्ष में, दूसरी नवरात्रि आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष में, तीसरी अश्विन मास में और अंतिम नवरात्रि माघ के महीने में पड़ती है। साल 2024 में आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष में आने वाली गुप्त नवरात्रि 06 जुलाई शनिवार से प्रारंभ हो रही है।

इस समस्त संसार को चलाने वाली परमशक्ति माँ भगवती, पृथ्वी के हर कण में विद्यमान हैं। स्वयं महाकाल शिव अपने अस्तित्व को शक्ति के बिना अधूरा मानते हैं। माँ भगवती से उत्पन्न हुई दस महाविद्याओं की उत्पत्ति में भगवान शिव की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। क्योंकि भगवान शिव ने ही एक बार माता पार्वती को तंत्र, मंत्र, और अनेक सिद्धियों का ज्ञान दिया था, जिसके फलस्वरूप, माता ने समय आने पर स्वयं को दस महविद्याओं के रूप में अवतरित किया।

माँ आदिशक्ति के अनेकों रूप हैं, और माता हर रूप में अलौकिक हैं। दस महाविद्याएं काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला - ये सभी माता के स्वरूप हैं। श्रीमंदिर पर हम आपके लिए लेकर आएं हैं माता से उत्पन्न हुई दस महाविद्याओं के प्रादुर्भाव की कथा। इस कथा का आनंद लेने के लिए यह लेख अंत तक पढ़ें-

महाविद्या की पौराणिक कथा (Story Of Mahavidya)


शिवपुराण में दस महाविद्याओं से सम्बंधित एक कथा का वर्णन है, जिसके अनुसार असुर रुरु का एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दुर्गमासुर था। वह एक अत्याचारी राक्षस था, जिसने ब्रह्मदेव से वरदान के रूप में चारों वेदों को माँग लिया था। चारों वेदों को अपने वश में करने के बाद उसने देवलोक और पृथ्वी पर आक्रमण कर दिया। वेदों के लुप्त हो जाने से पूरी सृष्टि में सारे मन्त्र भी लुप्त हो गए। और इससे हवन, पूजा, जप और देव साधना जैसी क्रियाओं का लोप हो गया। साधु, मुनि और अन्य देव गणों में हाहाकार मच गया। धरती पर अकाल पड़ने लगा और कई मनुष्य काल का ग्रास बनने लगे।

दुर्गमासुर ने इंद्र पर आक्रमण कर स्वर्गलोक को भी अपने वश में कर लिया। इस भयावह परिस्थिति से दुखी होकर सभी देवताओं ने त्रिदेव की शरण ली। परन्तु स्वयं ब्रह्मा -विष्णु - महेश के पास भी इस विकट समस्या का कोई हल नहीं था। ऐसे में केवल माँ आदिशक्ति ही इस सृष्टि की रक्षा कर सकती थीं। सब देवताओं ने त्रिदेव के साथ मिलकर माँ भगवती का स्मरण किया और उनसे प्रार्थना की, कि ‘हे माँ भगवती! कृपया इस दुर्गति से हमारी रक्षा कीजिये और दुर्गमासुर का नाश कीजिये।’ तब माँ भगवती ने दसों दिशाओं में अपने दस स्वरूपों को उत्पन्न किया, जो दस महाविद्याएं कहलाईं।

माँ के इन दस रूपों और दुर्गमासुर की विकराल सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ। यह युद्ध नौ दिनों तक चला और इन नौ दिनों में पृथ्वी पर प्रचुर वर्षा हुई, जिससे पृथ्वी पर फैला अकाल समाप्त हुआ। दस महाविद्याओं ने दुर्गमासुर की सम्पूर्ण सेना का नाश कर दिया। और अंत में यें दस महाविद्याएं एक रूप में समाहित हो गई और दिव्य प्रकाश से युक्त एक देवी ने अवतार लिया, जो सिंह पर सवार थीं और अपने एक हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए थीं। इस दिव्य रूप में प्रकट हुई देवी ने दुर्गमासुर का वध किया। चूँकि माता के इस अवतार ने संसार को दुर्गति से बचाया और दुर्गमासुर का नाश किया, इसीलिए उनके इस अवतार को दुर्गा नाम से पुकारा जानें लगा।

कौन हैं दस महाविद्याएं (Names Of 10 Mahavidyas)


काली-
यह प्रथम महाविद्या है। माता का यह रूप कृष्ण वर्ण है, और उन्होंने खप्पर धारण किया हुआ है। माता की जिह्वा अपने मुख से बाहर है। यह माता का उग्र स्वरूप है।

तारा-
तारा का अर्थ है सबको तारने वाली। काली माँ जब कृष्ण वर्ण से नीलवर्ण में परिवर्तित हुई तो उन्हें तारा नाम से संबोधित किया गया। माता का यह स्वरूप उग्र और सौम्य दोनों भावों का समागम है।

छिन्नमस्ता-
यह माता का उग्र स्वरूप है, जिसमें उनके एक हाथ में खड़ग है और दूसरे हाथ में स्वयं का कटा हुआ शीश है। इनके कटे हुए स्कंध से रक्त की तीन धारा बह रही हैं, जिससे उनका छिन्न मस्तक और उनकी दो सखियाँ जया और विजया रक्तपान कर रही हैं।

षोडशी-
यह माता का अत्यंत सौम्य स्वरूप है। इनकी छवि श्याम, रक्तिम और स्वर्णिम वर्णों युक्त प्रतीत होती है। माँ षोडशी को तीनों लोकों में सबसे सुन्दर माना गया है, इसीलिए इन्हें त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी जाना जाता है।

भुवनेश्वरी-
माता का यह रूप सौम्य है। ये संसार के सभी ऐश्वर्य की स्वामिनी मानी जाती है। इनका रूप माँ षोडशी के समान है। चार भुजाओं वाली माँ भुवनेश्वरी का एक हाथ अभी मुद्रा में और दूसरा हाथ वरद मुद्रा में है। शेष दो हाथों में माता ने अंकुश और रज्जु को धारण किया हुआ है।

भैरवी-
माता के इस स्वरूप में उग्र और सौम्य दोनों ही गुण समाहित है। इसीलिए उनका एक रूप महाकाली की तरह उग्र है, और दूसरा स्वरूप माँ पार्वती की तरह शांत है। माँ भैरवी महादेव के अवतार भैरव की अर्धांगिनी है।

धूमावती-
माता का यह रूप धूमवर्ण अर्थात धुंए के समान है। माता का यह रूप एक वृद्ध विधवा के समान है और इनका वाहन कौआ है। यह माता का उग्र स्वरूप भी कहलाता है।

बगलामुखी-
माता के इस रूप को पीताम्बरा भी कहा जाता है। इस संसार में उठने वाली हर तरंग का कारक माता का यही स्वरूप है। माँ बगलामुखी माता का उग्र रूप है।

मातंगी-
शिव का एक नाम मातंग है और मातंगी शिव की अर्धांगिनी हैं। हरितवर्णी अर्थात हरे वर्ण में अवतरित हुई माता मातंगी चतुर्भुजा है। माता के इस स्वरूप ने लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं। यह देवी आदिशक्ति का सौम्य स्वरूप है।

कमला-
माता का यह रूप सौम्य है। इन्हें तांत्रिक लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है। इनका संबंध तंत्र, सिद्धि, समृद्धि और सौभाग्य से है। माँ कमला कमल पर विराजमान हैं और अनेक आभूषण धारण किये हुए हैं। इनका स्वरूप स्वर्णिम है।


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