गणगौर क्यों मनाई जाती हैं?
गणगौर क्यों मनाई जाती हैं?

गणगौर क्यों मनाई जाती हैं?

11 अप्रैल 2024, बृहस्पतिवार जानें इस व्रत की विशेषता


गणगौर का त्योंहार क्यों मनाया जाता है? (Why is the festival of Gangaur celebrated?)

गणगौर का पावन पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। नव विवाहित महिलाएं व कुंवारी कन्याएं होली के दूसरे दिन से यह पूजा प्रारंभ करती हैं और चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन किसी नदी तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौर को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन शाम को उनका विसर्जन करती हैं। ऐसी मान्यता है कि कुंवारी कन्याओं को इस व्रत से उत्तम पति मिलता है, और सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है।

गणगौर क्यों मनाया जाता है? (Why Gangaur Is Celebrated)

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यानी नवरात्रि की तीसरे दिन गणगौर माता की पूजा की जाती है। माता पार्वती को गौर व भगवान शंकर के अवतार को ईशर माना जाता है। इस दिन को लेकर एक मान्यता है कि एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अत्यंत कठिन व्रत और तपस्या की। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और कहा- हे पार्वती! वरदान मांगो! पार्वती ने कहा- हे शिव-शंकर, मेरी एक ही आकांक्षा है कि मैं आपकी अर्धांगिनी बनूं। माता पार्वती जी की मनोकामना पूर्ण हुई और भगवान शंकर उन्हें पति रूप में मिले। तभी से कुंवारी कन्याएं अपनी इच्छा के अनुरूप वर पाने के लिए गणगौर और ईशर की उपासना करती हैं। सुहागिन स्त्रियां यह व्रत अपने सुहाग को अटल रखने के लिए करती हैं।

गणगौर कैसे मनाया जाता है? (How Gangaur Celebrated)

गणगौर प्रारंभ होने से लेकर 16 दिन तक महिलाएं हर सुबह जल्दी उठकर बगीचे में जाती हैं। वहां से दूब और फूल चुनकर लाती हैं, और गणगौर माता पर दूब से दूध के छीटें देती हैं। इस पूजा में माता को दही, सुपारी, चांदी का छल्ला आदि अर्पित किया जाता है। ऐसी मान्यता है की आठवें दिन ईशर अपनी पत्नी गणगौर के साथ ससुराल आते हैं। इस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के घर जाकर वहां से मिट्टी के बर्तन और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लाती हैं। उसी मिट्टी से ईशर जी, गणगौर माता, मालिन आदि की कई मूर्तियां बनाई जाती हैं। जिस स्थान पर पूजा की जाती है उसको गणगौर का मायका और जहां पर मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है, वह स्थान उनका ससुराल कहा जाता है। शादी के उपरांत कन्या पहली बार गणगौर अपने मायके में मनाती है, बाद में प्रतिवर्ष वो अपनी ससुराल में ही गणगौर का पूजन करती है। गणगौर का उद्यापन करते समय स्त्रियां अपनी सास को बायना, कपड़े तथा सुहाग की वस्तुएं देती हैं। साथ ही सोलह सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराकर उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार की वस्तुएं और दक्षिण दी जाती है।

गणगौर कहाँ कहाँ मनाया जाता है? (Where is Gangaur celebrated?)

यूं तो भारत के सभी प्रांतों में जहां मारवाड़ी रहते हैं, वहां शिव-गौरी पूजन का यह त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता हैं। लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के निमाड़, मालवा, बुंदेलखण्ड और ब्रज क्षेत्रों में गणगौर का पर्व प्रमुख रूप से मनाया जाता है।

गणगौर मेला/उत्सव क्या है? (What is Gangaur Fair/Festival?)

गणगौर उत्सव पर वस्त्र और आभूषणों से सजी-धजी, सुंदर लोटियों को सिर पर रखे, हज़ारों की संख्या में गाती हुई स्त्रियों के स्वर से जोधपुर का पूरा बाज़ार गूँज उठता है। पूरे राजस्थान में जगह-जगह गणगौर माता की सवारी निकाली जाती है। उदयपुर की धींगा, और बीकानेर की चांदमल गणगौर सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध मानी जाती हैं।

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