फाल्गुन पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि
फाल्गुन पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि

फाल्गुन पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि

जानें यहां पर संपूर्ण जानकारी


फाल्गुन पूर्णिमा व्रत (Falgun Purnima व्रत)

फाल्गुन माह में आने वाली पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। ये दिन जहां हमारे सबसे बड़े त्यौहार होली का उल्लास लेकर आता है, वहीं जातक इस दिन विधि-विधान से श्री हरि व माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं, एवं व्रत रखते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास वर्ष का अंतिम महीना होता है, एवं फाल्गुन पूर्णिमा साल का अंतिम दिन व अंतिम पूर्णिमा होती है। ये दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन होलिका दहन किया जाता है, साथ ही इसी पूर्णिमा तिथि पर लक्ष्मी जयंती का पर्व भी मनाया जाता है।

फाल्गुन पूर्णिमा व्रत 2024 (Falgun Purnima 2024 Date)

साल 2024 में फाल्गुन पूर्णिमा का व्रत 24 मार्च 2024 को किया पड़ रहा है। पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 24 मार्च 2024 को सुबह 09 बजकर 54 मिनट पर होगा और पूर्णिमा तिथि समाप्त 25 मार्च 2024 को दोपहर 12 बजकर 29 मिनट पर होगी।

फाल्गुन पूर्णिमा का महत्व (Importance Of Falgun Purnima)

फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इसीलिए इस पवित्र दिन पर सुबह स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। इस दिन माता लक्ष्मी की भी विधिवत् पूजा की जाती है। अधिकांश लोग इस दिन व्रत रखते हैं, और श्री सत्यनारायण भगवान की कथा भी सुनते हैं। ऐसा करने से भगवान लक्ष्मीनारायण की कृपा परिवार पर बनी रहती है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन किया गया व्रत-उपवास, पूजा-पाठ और स्नान-दान मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति दिलाने वाला होता है। यदि आप किसी कारण वश व्रत न भी कर पाएं तो भी अन्न दान अवश्य करें। फाल्गुन पूर्णिमा पर किया गया छोटा दान भी मनुष्य को अक्षय पुण्य प्रदान करता है। ऐसी मान्यता है कि फाल्गुन पूर्णिमा पर श्री विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना करने वाले भक्तों पर भगवान विष्णु-लक्ष्मी जी की विशेष कृपा होती है। उन्हें जीवनपर्यंत सुख-सौभाग्य, धन-संतान का सुख प्राप्त होता है, तथा मरणोपरान्त बैकुंठधाम गमन होता है।

पूर्णिमा एक ऐसी पावन तिथि है, जिस दिन जातक स्नान-दान, जप-तप आदि धार्मिक कार्य करके अपने पिछले सभी पापों के प्रभाव को नष्ट कर सकते हैं, साथ ही आने वाले जीवन को सुख-समृद्धि से भर सकते हैं। इसके अलावा भी कई ऐसे अद्भुत लाभ हैं, जो आपको पूर्णिमा तिथि पर मिलते हैं, चलिए उनके बारे में जानते हैं।

पहला लाभ- सुख-सौभाग्य व संतान का सुख पूर्णिमा पर किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को दान देने से भगवान विष्णु अत्यधिक प्रसन्न होते हैं, और जातक को अपनी कृपा का पात्र बनाकर उन्हें सुख-सौभाग्य, धन-संतान आदि का सुख प्रदान करते हैं।

दूसरा लाभ- धन-धान्य से भर जाएगा भंडार इस दिन गंगा नदी तट पर दीप दान करने से देवी लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होती हैं, और अपने आशीर्वाद स्वरूप, भक्तों का भंडार धन-धान्य से भर देती हैं।

तीसरा लाभ- असाध्य रोगों से मिलेगा छुटकारा पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की पूजा करने से चंद्र दोष नष्ट होता है, और चंद्र देव को खीर का भोग अर्पित करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे आर्थिक तंगी व असाध्य रोगों से छुटकारा मिलता है।

चौथा लाभ- दूर होगा बुरी आत्माओं का प्रभाव माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ हनुमान जी की पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, और आस-पास की बुरी आत्माओं का प्रभाव दूर हो जाता है।

पांचवां लाभ- मिलेगा पितरों का आशीर्वाद पूर्णिमा तिथि पर पितरों की शांति के लिए गंगा घाट पर तिल, कंबल, कपास, गुड़, घी और फल आदि का दान कर तर्पण करने से उनका आशीर्वाद मिलता है, और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

फाल्गुन पूर्णिमा व्रत पूजा की विधि (Puja Vidhi Of Falgun Purnima)

हिन्दू धर्म में पूर्णिमा तिथि को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस तिथि पर स्नान-दान, विष्णु पूजा और पितरों को तर्पण देने का विधान है। मान्यता है इस पूर्णिमा तिथि पर गंगा स्नान करने और विधिवत पूजा-अर्चना करने से जातक को कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है।

जानें पूर्णिमा की पूजा की तैयारी और इसकी विधि

पूजा से पहले किए जाने वाले कार्य

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कार्यों से निवृत हो जाएं। पूर्णिमा के दिन वैसे तो गंगा स्नान का विशेष महत्व है, लेकिन अगर ये संभव नहीं है तो आप किसी पवित्र जलाशय या नदी में स्नान कर सकते हैं। अगर ये भी संभव न हो तो, घर में ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। प्रातःकाल में स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें, और व्रत का संकल्प लें।

पूर्णिमा पर की जाने वाली भगवान विष्णु की पूजा विधि

पूर्णिमा तिथि पर भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की पूजा का विशेष महत्व है। इसके लिए पूर्व दिशा में एक चौकी स्थापित कर लें और चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उस स्थान को शुद्ध कर लें। अब चौकी पर अक्षत के कुछ दाने आसन के रूप में डालें, और भगवान विष्णु-लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर के साथ ही भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर लें। कलश में रखें जल को एक फूल की सहायता से लेकर स्नान के रूप में एक-एक करके सभी देवों पर छिड़कें। इसके पश्चात् चौकी के दायीं ओर अर्थात आपके बायीं ओर एक दीपक प्रज्वलित करें। अब “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः” मंत्र का जाप करते हुए आचमन कर अपनी आंतरिक शुद्धि करें। सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें। उन्हें हल्दी-रोली से तिलक करें। फिर उन्हें जनेऊ, लाल पुष्प और दूर्वा अर्पित करें। अब श्री हरि को हल्दी-चंदन का तिलक लगाएं और लक्ष्मी माता को कुमकुम-हल्दी का तिलक करें। सभी प्रतिमाओं को अक्षत अर्पित करें। इसके पश्चात् विष्णु भगवान को जनेऊ चढ़ाएं, पुष्प चढ़ाएं और पुष्प माला पहनाएं। माँ लक्ष्मी को भी कमल का फूल, पुष्प माला, मौली और सुहाग की सामग्री अर्पित करें। इसके पश्चात् चौकी पर धूप जलाएं। अब भोग में भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी को पंचामृत, पंजीरी, केला व अन्य फल और मिठाई का भोग लगाएं, इसमें तुलसी पत्र अवश्य रखें। भगवान गणेश जी को भी मिठाई और फल अर्पित करें। इन्हें तुलसी दल अर्पित न करें।
भोग के साथ भगवान को दक्षिणा भी अर्पित करें। अब फाल्गुन पूर्णिमा की कथा पढ़ें। आप इस दिन श्री सत्यनारायण भगवान की कथा भी पढ़ या सुन सकते हैं। इसके पश्चात् भगवान विष्णु की आरती उतारें। अंत में हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर भगवान से पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें और अक्षत व पुष्प को भगवान के चरणों में छोड़ दें। इसके पश्चात् अगर आप व्रत रख रहे हैं तो स्वयं फलाहार ग्रहण करें और परिवारजनों में प्रसाद वितरित कर दें।

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